यथासंभव श्राद्ध अपने घर पर ही किया जाना चाहिए। संभव न हो तो किसी भी तीर्थ या जलाशय के किनारे भी किया जा सकता है।
दक्षिणायन में चूंकि पितरों का प्रभाव ज्यादा होता है। इसलिए श्राद्धकर्म के लिए यथासंभाव दक्षिण की तरफ झुकी हुई जमीन का उपयोग करना चाहिए।
शास्त्रों के मुताबिक पितृगणों को ऐसी जगह भाती है, जो पवित्र हो और जहां लोगों का ज्यादा आना-जाना होता है, नदी का किनारा भी पितरों को पसंद है। ऐसी जगह पर गोबर से जमीन को लीपकर श्राद्ध करना चाहिए।
काले तिल और कुश तर्पण व श्राद्धकर्म में जरूरी हैं। क्योंकि माना जाता है कि यह भगवान विष्णु के शरीर से निकले हैं और पितरों को भी भगवान विष्णु का ही स्वरूप माना गया है। इनके बिना पितरों को जल भी नहीं मिलता।
श्राद्ध का पहला अधिकार पुत्र का होता है। पुत्र न होने पर पुत्री का पुत्र यानी नाती श्राद्ध करे।
जिनके कई पुत्र हो तो वहां सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करे। पुत्र के उपस्थित न होने पर पोता और पोता भी न होने पर परपोता श्राद्ध कर सकता है।
पुत्र व पोते की अनुपस्थिति में विधवा औरत को भी श्राद्ध का हक है। मगर पुत्र के न होने पर ही पति, पत्नी का श्राद्ध कर सकता है। इसी तरह पुत्र होने पर उसे ही माता का श्राद्ध करना चाहिए, पति को नहीं।
पुत्र, पोते या दामाद के न होने पर भाई का पुत्र भी श्राद्ध कर सकता है, यहां तक की दत्तक पुत्र या किसी उत्तराधिकारी को भी श्राद्ध करने का हक है।
श्राद्ध के एक दिन पहले श्राद्ध करने वाला विनम्रता के साथ साफ मन से विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए आमंत्रण देना चाहिए। क्योंकि ब्रह्मपुराण के मुताबिक ब्राह्मणों की देह में पितृगण वायु के रूप में मौजूद होते हैं और उनके साथ-साथ ही चलते हैं। उनके बैठते ही वे उनमें ही समाकर ब्राह्मणों के साथ ही बैठे होते हैं। उस वक्त श्राद्ध करने वाले का यह बोलना चाहिए कि- "मैं आपको आमंत्रित करता हूं।
पितृ शांति के लिए तर्पण का सही वक्त 'संगवकाल' यानी सुबह तकरीबन 8 से लेकर 11 बजे तक माना जाता है। इस दौरान किया गया जल से तर्पण पितरों को तृप्त करने के साथ पितृदोष और पितृऋण से छुटकारा भी देता है।












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