शास्त्रों में किसी भी व्यक्ति के लिए 5 धर्म-कर्म जरूरी बताए गए हैं। ये भूतयज्ञ, मनुष्य यज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ व ब्रह्मयज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। इनमें सारे जीवों के लिए अन्न-जल दान भूतयज्ञ, घर आए अतिथि की सेवा मनुष्य यज्ञ, स्वाध्याय व ज्ञान का प्रचार-प्रसार ब्रह्मयज्ञ और पितरों के लिए तर्पण व श्राद्ध करना पितृयज्ञ कहलाता है।
इनको महायज्ञ कहा गया है और इनसे किसी तरह का दोष नहीं लगता। किंतु पितृयज्ञ से ही पितृऋण से छुटकारा नहीं मिलता और ऐसे पितृदोष से मुक्ति के लिए श्राद्ध जरूरी बताया गया है।
हिन्दू धर्मग्रंथों में कई तरह के श्राद्ध अवसर विशेष पर करने का महत्व बताया गया है। इनमें खासतौर पर तिथि और पार्वण श्राद्ध का विशेष महत्व है।
तिथि श्राद्ध हर साल उस तिथि पर किया जाता है, जिस तिथि पर किसी व्यक्ति की मृत्यु हुई हो।
वहीं, पार्वण श्राद्ध हर साल पितृपक्ष में किए जाते हैं। इसे महालया या श्राद्ध पक्ष भी पुकारा जाता है। हर साल भादौ महीने की पूर्णिमा और आश्विन माह के कृष्ण पक्ष के 15 दिन सहित 16 दिन का श्राद्धपक्ष आता है।
इसी पक्ष में तिथि के मुताबिक किसी भी व्यक्ति को पितरों के लिए जल का तर्पण व श्राद्ध करना चाहिए। तिथि न मालूम होने या तिथि विशेष पर श्राद्ध चूकने पर इसी पक्ष में आने वाली सर्वपितृ अमावस्या या महालया पर पूर्वजों के लिए श्राद्ध, दान व तर्पण करना चाहिए।
स्कन्दपुराण में लिखा है कि मृत्यु तिथि पर श्राद्ध न करने वाले व्यक्ति को उसके पितृगण श्राप देकर पितृलोक चले जाते हैं। ऐसे व्यक्ति के परिवार को पितृदोष लगता है और वहां रोग, शोक, दरिद्रता, दु:ख व दुर्भाग्य का सामना करना पड़ता है।
ब्रह्म और ब्रह्मवैवर्तपुराण में क्रमश: लिखा है कि धन बचाने की लालसा से श्राद्ध न करने वाले का पितृगण रक्त पीते हैं, वहीं सक्षम होने पर श्राद्ध न करने वाला रोगी और वंशहीन हो जाता है।
इसी तरह विष्णु स्मृति के मुताबिक श्राद्ध न करने वाला नरक को प्राप्त होता है।
वायुपुराण के मुताबिक पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध, देवताओं की प्रसन्नता के लिए किए जाने वाले यज्ञ आदि धर्म-कर्मों से भी ज्यादा शुभ फल देते हैं। श्रद्धा से किए श्राद्ध से कई पीढिय़ों के पितरगण प्रसन्न होकर व्यक्ति को आयु, धन-धान्य, संतान और विद्या से संपन्न होने का आशीर्वाद देते हैं।
गरुड पुराण के मुताबिक इस पक्ष में श्राद्ध से पितरों को स्वर्ग मिलता है। यहीं नहीं जिनका श्राद्ध किया जाता है, उनको प्रेत योनि नहीं मिलती और वे पितर बन जाते हैं। ये पितर तृप्त होकर संतान के मनचाहे काम पूरे कर धर्मराज के मंदिर में पहुंच बड़ा ही सुख-सम्मान पाते हैं।












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