Sunday, September 22, 2013

धरती को मिनटों में दहला कर रख देता है ये हिंदुस्तानी 'तूफान', बिना लड़े हार जाते हैं दुश्मन

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भारत और पाकिस्‍तान के बीच हुई 1965 के युद्ध को 'द्वितीय कश्‍मीर युद्ध' के नाम से भी जाना जाता है। यह जंग संयुक्‍त राष्‍ट्र के दखल के बाद आज ही के दिन यानी 22 सितंबर को खत्‍म हुआ था। 22 सितंबर को संयुक्‍त राष्‍ट्र की सुरक्षा परिषद ने सर्वसम्‍मति से एक प्रस्‍ताव पारित किया जिसके तहत दोनों देशों को बिना शर्त के युद्धविराम करना था। इस तरह 22 सितंबर को ही यह जंग खत्‍म हो गई। 

इन सबके बीच आज हम आपको बताने जा रहे हैं भारत की सैन्य ताकत सी-17 ग्लोबमास्टर के बारे में। भारत लगातार अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए अत्याधुनिक तकनीक से लैस सैन्य साजोसामान जुटा रहा है। इसी कड़ी में भारतीय वायु सेना के बेड़े में सैन्य सामग्री ले जाने वाला एयर क्राफ्ट सी 17 ग्लोबमास्टर III  शामिल हुआ है।  
70 टन वजनी इस एयर क्राफ्ट के आने से भारतीय वायु सेना न सिर्फ ताकत बढ़ेगी बल्कि ज्यादा से ज्यादा सैन्य सामग्री युद्ध स्थल तक ले जाने की क्षमता भी बढ़ेगी। बता दें कि भारत यह एयरक्राफ्ट अमेरिका से खरीद रहा है जिसकी कीमत करीब 20000 करोड़ रुपए है। यह अपने साथ 80 टन वजनी सामग्री ले जा सकता है। 
ये एयरक्रॉफ्ट अमेरिकी ताकत का भी अहम हिस्सा है। आज अमेरिकी सेना में 223वां और आखिरी सी-17 ग्लोबमास्टर शामिल होगा। 
यह वर्तमान रशियन एयरक्राफ्ट il76 की जगह लेगा। चलिए हम आपको इसकी अन्य खूबियों के बारे में बताते हैं।

il 76 एयर क्राफ्ट फिलहाल सेना के बेड़े में मौजूद है। यह करीब 40 टन तक सामग्री अपने साथ ले जा सकता है।सेना में शामिल होने वाला नया एयर क्राफ्ट इस एयर क्राफ्ट से दो गुना ज्यादा सामग्री अपने साथ ले जा सकता है।


भारत ने ग्लोबमास्टर्स के साल 2011 में अमेरिका से सौदा तय किया था जिसमें करीब 10 एयर क्राफ्ट की डिलिवरी की बात थी। जैसे ही 10 एयर क्राफ्ट की डिलिवरी भारत को हो जाएगी उसके बाद 6 और एयर क्राफ्ट खरीदने के लिए भारत कदम बढ़ाएगा।

अंदर से कैसा दिखता है ग्लोब मास्टर्स



कैसा दिखता है ग्लोब मास्टर्स : 


आगे देखें कैसा दिखता है कॉकपिट




आगे देखें किस तरह से सैन्य समग्री लेकर जाता है  ग्लोब मास्टर्स



इस तरह से सैन्य समग्री लेकर जाता है  ग्लोब मास्टर्स


आगे देखें कैसा दिखता है ग्लोब मास्टर्स










एक दिन पापियों के पाप नहीं धो पाएगी गंगा, जानिए क्यों ?

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गंगा मइया अब कुछ वर्षों के बाद पापियों के पाप नहीं धो पाएगी। यह कोई भविष्यवाणी नहीं है हमारे शास्त्रों में लिखा एक सत्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड में हुई तबाही के संकेत भी शास्त्रों में ही लिखे पड़े हैं। गंगा एक दिन हमेशा के लिए लुप्त हो जाएगी।
केदारनाथ और बद्रीनाथ भी अपने स्थान पर नहीं होंगे। शास्त्रों में यह भी लिखा है कि जब यह सब होगा तो भोलेनाथ शिव कि पूजा कहां होगी। कैसे और किन परिस्थितियों में गंगा मानव जगत से नाराज हो कर चली जाएगी और उस वक्त कैसे होगी इन्सानों की मानसिकता?


भविष्य में गंगा नदी पुन: स्वर्ग चली जाएगी फिर गंगा किनारे बसे तीर्थस्थलों का कोई महत्व नहीं रहेगा। वे नाममात्र के तीर्थ स्थल होंगे। केदारनाथ को जहां भगवान शंकर का आराम करने का स्थान माना गया है वहीं बद्रीनाथ को सृष्टि का आठवां वैकुंठ  है, जहां भगवान विष्णु 6 माह निद्रा में रहते हैं और 6 माह जागते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह 12 धाराओं में बंट गई। इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई और यह स्थान बद्रीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना। अलकनंदा की सहचरणी नदी मंदाकिनी नदी के किनारे केदार घाटी है, जहां बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक सबसे महत्वपूर्ण केदारेश्वर है। यह संपूर्ण इलाका रुद्रप्रयाग जिले का हिस्सा है। रुद्रप्रयाग में भगवान रुद्र का अवतार हुआ था।

केदार घाटी में दो पहाड़ हैं- नर और नारायण पर्वत। पुराणों अनुसार गंगा स्वर्ग की नदी है और इस नदी को किसी भी प्रकार से प्रदूषित करने और इसके स्वाभाविक रूप से छेड़खानी करने का परिणाम होगा संपूर्ण जंबूखंड का विनाश और गंगा का पुन: स्वर्ग में चले जाना। हिंदुओं के अधिकतर तीर्थस्‍थल गंगा, यमुना, कृष्णा, गोदावरी, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, कावेरी, नर्मदा आदि नदियों के किनारे स्थित हैं। भारत के लोगों ने जहां गंगा नदी को पूरी तरह से तबाह कर दिया है वहीं सभी हिंदू तीर्थस्थलों पर व्यापारिक विकास और गंदगी के चलते बर्बाद कर दिया है। इस सबके चलते अब गंगा ने पुन: स्वर्ग में जाने की तैयारी कर ली है।


पुराणों अनुसार भूकंप, जलप्रलय और सूखे के बाद गंगा लुप्त हो जाएगी और इसी गंगा की कथा के साथ जुड़ी है बद्रीनाथ और केदारनाथ तीर्थस्थल की रोचक कहानी.नृसिंह भगवान की मूर्ति : अब बद्रीनाथ में नहीं होंगे भगवान के दर्शन, क्योंकि मान्यता अनुसार शीमठ में स्थित नृसिंह भगवान की मूर्ति का एक हाथ साल-दर-साल पतला होता जा रहा है।


माना जाता है कि जिस दिन नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे, बद्रीनाथ का मार्ग पूरी तरह बंद हो जाएगा। भक्त बद्रीनाथ के दर्शन नहीं कर पाएंगे। उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा इस बात की ओर इशारा करती है कि मनुष्य ने विकास के नाम पर तीर्थों को विनाश की ओर धकेला है और तीर्थों को पर्यटन की जगह समझकर मौज-मस्ती करने का स्थान समझा है तो अब इसका भुगतान भी करना होगा।


पुराणों अनुसार आने वाले कुछ वर्षों में वर्तमान बद्रीनाथ धाम और केदारेश्वर धाम लुप्त हो जाएंगे और वर्षों बाद भविष्य में भविष्यबद्री नामक नए तीर्थ का उद्गम होगा।अलकनंदा और मंदाकिनी इन दोनों नदियों का पवित्र संगम रुद्रप्रयाग में होता है और वहां से ये एक धारा बनकर पुन: देवप्रयाग में ‘भागीरथी-गंगा’ से संगम करती हैं।

देवप्रयाग में गंगा उत्तराखंड के पवित्र तीर्थ ‘गंगोत्री’ से निकलकर आती है। देवप्रयाग के बाद अलकनंदा और मंदाकिनी का अस्तित्व विलीन होकर गंगा में समाहित हो जाता है तथा वहीं गंगा प्रथम बार हरिद्वार की समतल धरती पर उतरती है। भगवान केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद बद्री क्षेत्र में भगवान नर-नारायण का दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे जीवन-मुक्ति भी प्राप्त हो जाती है। इसी आशय को शिवपुराण के कोटि रुद्र संहिता में भी व्यक्त किया गया है।


बद्रीनाथ की कथा अनुसार सतयुग में देवताओं, ऋषि-मुनियों एवं साधारण मनुष्यों को भी भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन प्राप्त होते थे। इसके बाद आया त्रेतायुग- इस युग में भगवान सिर्फ देवताओं और ऋषियों को ही दर्शन देते थे, लेकिन द्वापर में भगवान विलीन ही हो गए। इनके स्थान पर एक विग्रह प्रकट हुआ। ऋषि-मुनियों और मनुष्यों को साधारण विग्रह से संतुष्ट होना पड़ा।
शास्त्रों अनुसार सतयुग से लेकर द्वापर तक पाप का स्तर बढ़ता गया और भगवान के दर्शन दुर्लभ हो गए। द्वापर के बाद आया कलियुग, जो वर्तमान का युग है। पुराणों में बद्री-केदारनाथ के रूठने का जिक्र मिलता है। पुराणों अनुसार कलियुग के पांच हजार वर्ष बीत जाने के बाद पृथ्‍वी पर पाप का साम्राज्य होगा। कलियुग अपने चरम पर होगा तब लोगों की आस्था लोभ, लालच और काम पर आधारित होगी। सच्चे भक्तों की कमी हो जाएगी। ढोंगी और पाखंडी भक्तों और साधुओं का बोलबाला होगा। ढोंगी संतजन धर्म की गलत व्याख्‍या कर समाज को दिशाहीन कर देंगे, तब इसका परिणाम यह होगा कि धरती पर मनुष्यों के पाप को धोने वाली गंगा स्वर्ग लौट जाएगी।

पाताल में धंसता हुआ शिवलिंग सुना रहा है दुनिया में बढ़ते पाप की कहानी

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हिमालय की गोछ में बसे एक एतिहासिक गांव में एक मंदिर में स्थापित शिवलिंग पाताल में धंसता जा रहा है। ऐसी मान्यता है कि पाताल में उस दिन यह शिवलिंग पूरी तरह समा जाएगा जिस दिन दुनिया में पापी अपनी हदों से गुजर जाएंगे। इसी मंदिर में पाताल जाने का एक गुप्त रास्ता भी है। जहां से पाताल होकर कैलाश पर्वत पहुंच कर ऋषिमुनि शिव तपस्या करने जाते थे। कहां है यह मंदिर और कैसे शिवलिंग धंसता जा रहा है पाताल में ?

हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक सुन्दरता से ओत-प्रोत काँगड़ा घाटी की गोद में हेरीटेज गाँव परागपुर से लगभग 8 किलोमीटर की दुरी पर स्तिथ है आदिदेव भगवान शिव का अति प्राचीन श्री महाकालेश्वर मंदिर। व्यास नदी के सोम्य जल प्रवाह से छूते हुए इस आकर्षक मंदिर का सम्बन्ध हिन्दू धर्म के दोनों महाकाव्यों रामायण ओर महाभारत से जोड़ा जाता है। इस मंदिर का एक बड़ा भाग अपने प्राचीन गुबंदों ओर आकर्षक मंदिर श्रीन्खला से इस महान स्थान की प्राचीनता दर्शाता है।


रावण इतना बड़ा शिव भक्त था कि हिमालय कि श्रृंखला के ऊपर केलाश पर्वत पर जाकर भगवान शिव कि आराधना किया करता था। पोराणिक कथाओं के अनुसार लंकापति रावण श्रावण मॉस और अन्य विशेष दिनों पर भगवान शिव की आराधना करने के लिए महाकालेश्वर धाम से ही जाता था। रावण यहां से पाताल लोक से होते हुए सीधे कैलाश पर्वत पर आराधना में लीन हो जाता था। लोक मान्यतायों के अनुसार जैसे-जैसे पृथ्वी पर पाप बढ़ता जाएगा महाकालेश्वर का शिव लिंग पाताल लोक में स्थापित हो जायेगा। इस वक्त शिव लिंग भूगर्भ में स्थापित है ओर धीरे-धीरे पाताल में धंस रहा है।  लंकापति रावण इस दिव्या स्थान पर समाधि लगा कर भगवान शिव की आराधना किया करता था।


वहीं दूसरी और इस धाम का सम्बंध महाभारत काल से भी है महाभारत काल में जब सम्राट धृतराष्ट्र को जनमानस के आगे झुकते हुए धर्मराज युधिष्ठर को हस्तिनापुर का युवराज घोषित करना पड़ा तो कौरवों के मामा शकुनी ने षड्यंत्र रचकर पांचों पांडव भाइयों सहित माता कुंती को आखेट के दौरान लाख से निर्मित भवन में ठहराया। पूर्व नियोजित षडयंत्र के अनुसार मौका पाकर लाख से निर्मित भवन में आग लगा दी।  लेकिन महात्मा विदुर ने पांडवों को जलने से बचा लिया। उसके बाद पांडव घुमते हुए जिस स्थान पर ठहरे उस स्थान में तीर्थस्थल बनते गए। मान्यता के अनुसार पांडव इस दिव्या स्थान महाकालेश्वर में भी ठहरे थे और इस दौरान माता कुंती ने अपने पुत्रों से तीर्थ यात्रा पर जा कर गंगा स्नान करने कि इच्छा जाहिर कि पांडव उन दिनों अज्ञात वास पर थे वे तीर्थ यात्रा पर माता कुंती को नहीं भेज सकते थे।


इसलिए कुंती पुत्र अर्जुन ने दिव्या बाण चला कर एक नहीं पुरे पांच तीर्थों का जल यहाँ प्रवाहित किया था। इसलिए इस स्थान को पंचतीर्थी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि जो भी यहां स्नान करता है सभी पापों से मुक्ति पता है। इस स्थान को इंसान कीअंतिम धाम के रूप में भी जाना जाता है। यहां से स्वर्ग धाम को भी रास्ता है। ये स्थान धरातल में स्थापित हो जाएगा। पाताल लोक  जाने के लिए यहीं से गुप्त रास्ता भी है। इस स्थान को आदिशक्ति श्री माता चिन्तपुरनी के महारुद्र के रूप से भी जाना जाता है। पृथ्वी पर माता सती के जलते हुए शरीर के 52 टुकड़े गिरे थे और 52 शक्तिपीठ स्थापित हुए। हर शक्तिपीठ की चारों दिशाओं पर भगवान शिव के महारुद्र स्थापित हुए, महाकालेश्वर मां चिन्तपुरनी का पूर्व दिशा का महारुद्र है वहीं पश्चिम दिशा में महा नारायणी, उत्तर दिशा में महा शिव बाड़ी ओर दक्षिण दिशा में महा मुचकुंद स्थापित हैं।

ये है पाकिस्तान की 'आदमखोर' सेना, देखें हिंदस्तान के दुश्मन देश की पोल खोलती तस्वीरें.. - 2

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साल भर के शिक्षा बजट के बराबर है पाक सेना के एक दिन का खर्चा
पाक सरकार अपनी सेना पर प्रतिदिन 1.35 बिलियन रुपए यानी 135 करोड़ रुपए खर्च करता है। यह खर्चा उसके सालभर के शिक्षा बजट के बराबर है।


मजेदार बात तो यह है कि यह खर्चा सिर्फ सेलरी और ऑपरेटिंग एक्सपेंस के रूप में होता है।
इसके अलावा पाकिस्तान 86 लाख रुपए प्रतिदिन राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पर खर्च करता है।
 

पाकिस्तान के इस साल के बजट में करीब 49521.5 करोड़ रुपए केवल सेना पर खर्च करने लिए शामिल किए गए हैं। इससे केवल रक्षासामग्री खरीदी जाएगी और उनका  मेंटेनेंस किया जाएगा। 
 

78 लाख रुपए सिनेट और नेशनल असेंबली पर प्रतिदिन खर्च करता है। साथ ही तीन लाख रुपए हर दिन के हिसाब से मानवाधिकार पर खर्च करता है।


हेल्थ  मिनिस्ट्री का साल २क्१क्-२क्११ का बजट 2690 लाख रुपए था जबकि वायु सेना 2908.6 लाख रुपए एक दिन में ही खर्च कर डालती है। साथ ही नौसेना का एक दिन  का खर्चा 1489 लाख रुपए है। 


वायुसेना का एक दिन का खर्च सालाना स्वास्थ्य बजट से भी ज्यादा है। चौकाने वाली बात यह है कि पाकिस्तान का सालाना स्वास्थ्य बजट जितना है, वहां की वायु सेना उससे कहीं ज्यादा तो एक दिन में ही खर्च कर डालती है।
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ये है पाकिस्तान की 'आदमखोर' सेना, देखें हिंदस्तान के दुश्मन देश की पोल खोलती तस्वीरें.. - 1

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भारत और पाकिस्‍तान के बीच हुई 1965 के युद्ध को 'द्वितीय कश्‍मीर युद्ध' के नाम से भी जाना जाता है। यह जंग संयुक्‍त राष्‍ट्र के दखल के बाद आज ही के दिन यानी 22 सितंबर को खत्‍म हुआ था। 22 सितंबर को संयुक्‍त राष्‍ट्र की सुरक्षा परिषद ने सर्वसम्‍मति से एक प्रस्‍ताव पारित किया जिसके तहत दोनों देशों को बिना शर्त के युद्धविराम करना था। इस तरह 22 सितंबर को ही यह जंग खत्‍म हो गई। 
 
इन सबके बीच हम आपको ऐसे आंकड़ों के बारे में जानकारी दे रहे हैं, जिससे पाकिस्तान की जमीनी हकीकत का पर्दाफाश हो जाएगा..
 
ऐसा कहा जाता है कि पाकिस्तान में गरीबी और भूखमरी का बहुत बुरा हाल है। आलम यह है कि कुल जनसंख्या का करीब 25 से 27 प्रतिशत हिस्सा गरीब लोगों से  भरा हुआ है। इसके बावजूद पाकिस्तान अपनी खूंखार सेना पर बेशुमार दौलत लुटाता है। बेहद शातिर पाक सेना के एक दिन खर्चा ही इतना है कि उन पैसों से पाक से  गरीबी मिटाने के हार संभव प्रयास किए जा सकते हैं।
 
उसके मुकाबले भारतीय सेना का सालभर का बजट कहीं ज्यादा है। भारत सरकार इस साल सेना बजट तकरीबन  2,03,672.1 करोड़ रुपए का है। जबकि पाक अच्छे से जानता है कि आर्थिकरूप से उसकी औकात भारत से कहीं कम है लेकिन फिर भी वह ओछी हरकतों से बाज नहीं आता।


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Saturday, September 21, 2013

पतंजलि योगपीठ हरिद्वार

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क्यों जरूरी है पूर्वजों का श्राद्ध? जानिए पितृपक्ष से जुड़े ऐसे कई सवालों के जवाब - ४

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इसी तरह शास्त्रों के मुताबिक तर्पण के बाद बाकी श्राद्ध कर्म के लिए सबसे शुभ और फलदायी समय 'कुतपकाल' होता है। ज्योतिष गणना के अनुसार यह वक्त हर तिथि पर सुबह तकरीबन 11.36 से दोपहर 12.24 तक होता है।

धार्मिक मान्यता है कि इस समय सूर्य की रोशनी और ताप कम होने के साथ-साथ पश्चिमाभिमुख हो जाते हैं। ऐसे हालात में पितर अपने वंशजों द्वारा श्रद्धा से भोग लगाए कव्य बिना किसी परेशानी के ग्रहण करते हैं। इसलिए इस समय पितृकार्य करने के साथ पितरों की प्रसन्नता के लिए पितृस्तोत्र का पाठ भी करना चाहिए।



ब्राह्मण भोजन से पहले श्राद्ध के लिए बनाए गए भोजन में से पंचबली यानी गाय, कुत्ते, कौआ, देवता व चींटी सभी के लिए थोड़ा हिस्सा निकाल एक पात्र में रखें। हाथ में जल, फूल, अक्षत, तिल व चंदन लेकर संकल्प करें और कौए का हिस्सा कौए को, कुत्ते का कुत्ते को और बाकी हिस्से गाय को खिला सकते हैं। 

याज्ञवल्क्य स्मृति के मुताबिक श्राद्ध करने वाले को श्राद्ध तिथि पूरी होने तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। यही नहीं, सहवास, हजामत, गुस्सा करने, दूसरों का भोजन करने, सफर करना जैसे काम नहीं करने चाहिए। पान खाना या सौंदर्य प्रसाधन की चीजों का उपयोग भी नहीं करना चाहिए। 


श्राद्ध की शुरुआत व आखिर में 3 बार यह श्लोक बोलना चाहिए - देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च नम: स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नम:।



क्यों जरूरी है पूर्वजों का श्राद्ध? जानिए पितृपक्ष से जुड़े ऐसे कई सवालों के जवाब - ३

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यथासंभव श्राद्ध अपने घर पर ही किया जाना चाहिए। संभव न हो तो किसी भी तीर्थ या जलाशय के किनारे भी किया जा सकता है। 
 
दक्षिणायन में चूंकि पितरों का प्रभाव ज्यादा होता है। इसलिए श्राद्धकर्म के लिए यथासंभाव दक्षिण की तरफ झुकी हुई जमीन का उपयोग करना चाहिए। 
 
शास्त्रों के मुताबिक पितृगणों को ऐसी जगह भाती है, जो पवित्र हो और जहां लोगों का ज्यादा आना-जाना होता है, नदी का किनारा भी पितरों को पसंद है। ऐसी जगह पर गोबर से जमीन को लीपकर श्राद्ध करना चाहिए। 

काले तिल और कुश तर्पण व श्राद्धकर्म में जरूरी हैं। क्योंकि माना जाता है कि यह भगवान विष्णु के शरीर से निकले हैं और पितरों को भी भगवान विष्णु का ही स्वरूप माना गया है। इनके बिना पितरों को जल भी नहीं मिलता।


श्राद्ध का पहला अधिकार पुत्र का होता है। पुत्र न होने पर पुत्री का पुत्र यानी नाती श्राद्ध करे। 
जिनके कई पुत्र हो तो वहां सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करे। पुत्र के उपस्थित न होने पर पोता और पोता भी न होने पर परपोता श्राद्ध कर सकता है। 
पुत्र व पोते की अनुपस्थिति में विधवा औरत को भी श्राद्ध का हक है। मगर पुत्र के न होने पर ही पति, पत्नी का श्राद्ध कर सकता है। इसी तरह पुत्र होने पर उसे ही माता का श्राद्ध करना चाहिए, पति को नहीं। 
पुत्र, पोते या दामाद के न होने पर भाई का पुत्र भी श्राद्ध कर सकता है, यहां तक की दत्तक पुत्र या किसी उत्तराधिकारी को भी श्राद्ध करने का हक है। 

श्राद्ध के एक दिन पहले श्राद्ध करने वाला विनम्रता के साथ साफ मन से विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए आमंत्रण देना चाहिए। क्योंकि ब्रह्मपुराण के मुताबिक ब्राह्मणों की देह में पितृगण वायु के रूप में मौजूद होते हैं और उनके साथ-साथ ही चलते हैं। उनके बैठते ही वे उनमें ही समाकर ब्राह्मणों के साथ ही बैठे होते हैं। उस वक्त श्राद्ध करने वाले का यह बोलना चाहिए कि- "मैं आपको आमंत्रित करता हूं। 


पितृ शांति के लिए तर्पण का सही वक्त 'संगवकाल' यानी सुबह तकरीबन 8 से लेकर 11 बजे तक माना जाता है। इस दौरान किया गया जल से तर्पण पितरों को तृप्त करने के साथ पितृदोष और पितृऋण से छुटकारा भी देता है।

क्यों जरूरी है पूर्वजों का श्राद्ध? जानिए पितृपक्ष से जुड़े ऐसे कई सवालों के जवाब - २

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शास्त्रों में किसी भी व्यक्ति के लिए 5 धर्म-कर्म जरूरी बताए गए हैं। ये भूतयज्ञ, मनुष्य यज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ व ब्रह्मयज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। इनमें सारे जीवों के लिए अन्न-जल दान भूतयज्ञ, घर आए अतिथि की सेवा मनुष्य यज्ञ, स्वाध्याय व ज्ञान का प्रचार-प्रसार ब्रह्मयज्ञ और पितरों के लिए तर्पण व श्राद्ध करना पितृयज्ञ कहलाता है। 
इनको महायज्ञ कहा गया है और इनसे किसी तरह का दोष नहीं लगता। किंतु पितृयज्ञ से ही पितृऋण से छुटकारा नहीं मिलता और ऐसे पितृदोष से मुक्ति के लिए श्राद्ध जरूरी बताया गया है।
हिन्दू धर्मग्रंथों में कई तरह के श्राद्ध अवसर विशेष पर करने का महत्व बताया गया है। इनमें खासतौर पर तिथि और पार्वण श्राद्ध का विशेष महत्व है। 
तिथि श्राद्ध हर साल उस तिथि पर किया जाता है, जिस तिथि पर किसी व्यक्ति की मृत्यु हुई हो। 
वहीं,  पार्वण श्राद्ध हर साल पितृपक्ष में किए जाते हैं। इसे महालया या श्राद्ध पक्ष भी पुकारा जाता है। हर साल भादौ महीने की पूर्णिमा और आश्विन माह के कृष्ण पक्ष के 15 दिन सहित 16 दिन का श्राद्धपक्ष आता है।


इसी पक्ष में तिथि के मुताबिक किसी भी व्यक्ति को पितरों के लिए जल का तर्पण व श्राद्ध करना चाहिए। तिथि न मालूम होने या तिथि विशेष पर श्राद्ध चूकने पर इसी पक्ष में आने वाली सर्वपितृ अमावस्या या महालया पर पूर्वजों के लिए श्राद्ध, दान व तर्पण करना चाहिए। 


स्कन्दपुराण में लिखा है कि मृत्यु तिथि पर श्राद्ध न करने वाले व्यक्ति को उसके पितृगण श्राप देकर पितृलोक चले जाते हैं। ऐसे व्यक्ति के परिवार को पितृदोष लगता है और वहां रोग, शोक, दरिद्रता, दु:ख व दुर्भाग्य  का सामना करना पड़ता है। 
ब्रह्म और ब्रह्मवैवर्तपुराण में क्रमश: लिखा है कि धन बचाने की लालसा से श्राद्ध न करने वाले का पितृगण रक्त पीते हैं, वहीं सक्षम होने पर श्राद्ध न करने वाला रोगी और वंशहीन हो जाता है। 
इसी तरह विष्णु स्मृति के मुताबिक श्राद्ध न करने वाला नरक को प्राप्त होता है। 
वायुपुराण के मुताबिक पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध, देवताओं की प्रसन्नता के लिए किए जाने वाले यज्ञ आदि धर्म-कर्मों से भी ज्यादा शुभ फल देते हैं। श्रद्धा से किए श्राद्ध से कई पीढिय़ों के पितरगण प्रसन्न होकर व्यक्ति को आयु, धन-धान्य, संतान और विद्या से संपन्न होने का आशीर्वाद देते हैं।
 
गरुड पुराण के मुताबिक इस पक्ष में श्राद्ध से पितरों को स्वर्ग मिलता है। यहीं नहीं जिनका श्राद्ध किया जाता है, उनको प्रेत योनि नहीं मिलती और वे पितर बन जाते हैं। ये पितर तृप्त होकर संतान के मनचाहे काम पूरे कर धर्मराज के मंदिर में पहुंच बड़ा ही सुख-सम्मान पाते हैं।